ROK Movement – Random Acts of Kindness


  1. Help someone carry their pushchair up/down the stairs
  2. Good servicing requires a lot of effort; tip them!
  3. Go green – don’t waste paper
  4. Bake something for your family/friends
  5. Old laptop or mobile lying around? Donate it

ROK Movement – Random Acts of Kindness


  1. Life can get really busy – take some time out to spend with a family member
  2. It can get lonely when you are old, pay your grandparents a visit
  3. Hug your parents
  4. Go green – don’t waste paper
  5. Save water – turn the tap off when brushing your teeth!

Bad Poetry – Through The Window – Medium


CC0
I was never a saint in their eyes,
all they saw was bad poetry
Play dates, beyond the gates
You and I were fate, Fated
to the last goodbye, hello,
I can’t say why, but there’s
a glistening in your eye

Sainted marines beyond the trenches
Dark on the handle and green in the eyes,
green on the benches, Slump on the rock,
Docking in the still of time, Mirages passing
thorough illusions,
It’s you and I,
this is me,
I’m the other on your side
This is you,
almost blue
like the red on my roses
The blood on my paths,
I’m reaching out towards the sky
just to see you,

The dreams of my past, passing by
Byes, steering fate, no wheels under the gate
Opening like a sliding door risen off heaven,
My bad poetry is me seeing you

Even when you’re not there,
Your you, my love is due
Straining my eyelids
because I’m thinking of you

via Bad Poetry – Through The Window – Medium

New year a different perspective


कुछ मित्रों ने अभी से नव वर्ष की अग्रिम शुभकामना की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दिया है।
इस परिप्रेक्ष्य मे मैं आप सब के समक्ष राष्ट्रकवि श्रद्धेय रामधारी सिंह ” दिनकर ” जी की कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये व्यवहार नहीं
धरा ठिठुरती है सर्दी से
आकाश में कोहरा गहरा है
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है
सूना है प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं
चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही
उल्लास मंद है जन -मन का
आयी है अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो
प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य – श्यामला धरती माता
घर -घर खुशहाली लायेगी
तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा
युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं

✍🏻राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर